Saturday, February 6, 2010

नज़्म उलझी हुई है सीने में
मिसरे अटके हुए हैं होठों पर

लफ्ज़ काग़ज़ पर बैठते ही नहीं
उड़ते फिरते हैं तितलियों की तरह

कब से बैठा हूँ जानम
सादे काग़ज़ पे लिखके नाम तेरा

बस तेरा नाम ही मुकम्मल है
इससे बेहतर भी नज़्म क्या होगी


----Gulzar

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